पांचवें धाम मेंं होने वाले मेले का महात्म्य

पांचवें धाम मेंं होने वाले मेले का महात्म्य 


 टिहरी। हरेेक तीन साल में 11गते मंगसीर  को 'सेम मुखेम' मेले का आयोजन किया जाता है।  'सेम मुखेम' की  मान्यता उत्तराखंड का पांचवें धाम के रुप में है। इस धाम के बारे में कहा जाता है कि यहां भगवान श्री कृष्ण को कई रूपों में पूजा जाता हैै। उन्हीं रूपों में से एक भगवान नागराज का रुप भी है। उत्तराखंड की पावन धरती देवस्थल है। यहां हरेक कोने-कोने (पर्वतीय श्रृंखलाओं) में देवी-देवताओं का वास है। भला जिस पावन भूमि में देवोंं का वास हो वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता और प्रासंगिकता का पुराणों में कैसेे न उसका वर्णन हो। इसी को लेकर एक और कथा भी प्रचलित है जो कि भगवान श्री कृष्ण से जुड़े हुई है और रमणीक स्थल उत्तराखंड की सुन्दरता और पवित्रता दर्शाती है। वैसे तो सेम नागराजा से जुड़ी कई कहानियां प्रचलित हैं किन्तु यहाँ के स्थानीय जनमानस से मुखातिब होकर भगवान नागराज  के अनेक रुपों को वर्णन सुनाया जा सकता है कि कैसे भगवान श्री कृष्ण यहाँ आये थे और कैसे इस पावन भूमि से उनका लगाव हुवा तब प्रभु श्री कृष्णा ने यहीं रहने का फैसला लिया पर भगवान के पास यहाँ रहने के लिए जगह नहीं थी तो प्रभु की लीला देखिए उन्होंने रमोला नाम के एक राजा जो कि इस पावन भूमि पर रहते थे उनसे यहाँ रहने के लिए जगह मांगी राजा रमोला जो कि श्री कृष्ण जी के बहनोई भी थे, भगवान को अधिक पसंद नहीं करते थे, तो उन्होंने श्री कृष्ण जी को जगह देने से मना कर दिया। किन्तु भगवान श्री कृष्ण को देव धरती इतनी पसंद आई कि उन्होंने बस यहीं रहने का मन बना लिया था। काफी मान-मनुहार के बाद स्थानीय राजा रमोला ने भगवान को ऐसी भूमि दी जहाँ पर वह अपनी गायों और भैंसों को बांधता था। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण ने वहां एक मंदिर की स्थापना की जो तब से आज तक सेम नागराजा के रूप में प्रचलित हैं। राजा रमोला इस बात से अनजान था कि प्रभु स्वयं उसके पास आये हैंं काफी समय तक भगवान उसी स्थान पर रहे एक दिन नागवंशी राजा के स्वप्न में भगवान श्री कृष्ण आये और उन्होंने नागवंशी राजा को अपने यहाँ होने के बारे में बताया। नागवंशी राजा ने अपनी सेना के साथ प्रभु के दर्शन करने चाहे पर राजा रमोला ने उन्हें अपनी भूमि पर आने से मना कर दिया जिस से नागवंशी राजा क्रोधित हो गये और उन्होंने राजा रमोला पर आक्रमण करना चाहा। आक्रमण होने से पहले ही नागवंशी राजा ने राजा रमोला को प्रभु के बारे में बताया फिर प्रभु श्री कृष्ण का रूप देखकर राजा रमोला को अपने कृत्य पर लज्जा हुई। उसके बाद से प्रभु वहां पर नागवंशियों के राजा नागराज के रूप में माने जाने लगे कुछ समय पश्चात प्रभु ने वहां मंदिर में सदैव के लिए एक बड़े से पत्थर के रूप में आकार लेकर विराजमान होना स्वीकार किया और परमधाम के लिए चले गये। उसी पत्थर को आज भी नागराजा के रूप में पूजने का विधान है। स्थानीय लोगों की आस्था के अनुसार प्रभु का एक अंश आज भी इसी पत्थर पर स्थापित है और श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होते देख इस देव धाम की महत्ता को करीब से समझा जा सकता है।


मंदिर की पौराणिक मान्यता और भौगोलिक वस्तु स्तिथि:- 
जनपद टिहरी गढ़वाल के प्रताप नगर तहसील में समुद्र तल से तकरीबन 7000 हजार फीट की ऊंचाई पर भगवान श्रीकृष्ण नागराज स्वरुप में विराजतेे हैैं। मन्दिर का मुख द्वार 14 फुट चौड़ा तथा 27 फुट ऊँचा है। इसमें नागराज फन फैलाये हैं और भगवान कृष्ण नागराज के फन के ऊपर वंशी की धुन में लीन हैं। मन्दिर में प्रवेश के बाद नागराजा के दर्शन होते हैं। मन्दिर के गर्भगृह में नागराजा की स्वयं भू-शिला है। ये शिला द्वापर युग की बतायी जाती है। मन्दिर के दाँयी तरफ गंगू रमोला के परिवार की मूर्तियाँ स्थापित की गयी हैं। सेम नागराजा की पूजा करने से पहले गंगू रमोला की पूजा की जाती है
वाहन से तीर्थ स्थल तक पहुंचने दूरी:-
यात्री नयी टिहरी होते हुए या उत्तरकाशी होते हुए  पवन स्थल तक पहुँच सकते हैंं। वाहन से तलबला सेम तक की दूरी तय कर सकते हैं उसके बाद लगभग ढ़ाई किलोमीटर की पैदल दूरी तय कर मंदिर प्रांगण तक पहुंचा जा सकता है। पैदल मार्ग सुन्दर आच्छादित वनों से ढ़का होता है जिसके आकर्षण का केंद्र उसके वन क्षेत्र है। जो बांज, बुरांश, खर्सू, केदारपती के वृक्षों से सुसज्जित मिलेगा। 


तीर्थ स्थल की महत्ता :-
हर 3 साल में सेम मुखेम में एक भव्य मेले का आयोजन होता हैं जो कि मार्गशीर्ष माह की 11 गते को होता है | इस मेले के बहुत से धार्मिक महत्व हैं इसलिए हजारों की संख्या में इस दिन लोग भगवान नागराजा के दर्शन करने आते हैं | भगवान नागराजा के मंदिर में नाग-नागिन का जोड़ा चढ़ाने की भी परम्परा प्रचलित है जिसका की बहुत महत्व है।